Tuesday, November 3

Editorial

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की मानद डॉक्टरेट: ज्ञान, विज्ञान और राष्ट्रसेवा को मिला वैश्विक सम्मान
Editorial, Natioanal

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की मानद डॉक्टरेट: ज्ञान, विज्ञान और राष्ट्रसेवा को मिला वैश्विक सम्मान

नई दिल्ली। भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान वैज्ञानिक और युवाओं के प्रेरणास्रोत डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों और राष्ट्रसेवा तक सीमित नहीं था, बल्कि दुनिया भर के शैक्षणिक संस्थानों ने भी उनके ज्ञान, शोध, नेतृत्व और मानवता के प्रति योगदान को सम्मानित किया। इसी क्रम में उन्हें भारत और विदेशों के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों द्वारा Honorary Doctorate यानी मानद डॉक्टरेट की उपाधियों से सम्मानित किया गया। डॉ. कलाम के सम्मान में प्रदान की गई मानद उपाधियां उनके लिए केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं थीं, बल्कि विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और राष्ट्रनिर्माण के क्षेत्र में उनके योगदान की अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी थीं। उनके सम्मान की विशेषता यह रही कि विभिन्न विश्वविद्यालयों ने उन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में Doctor of Science, Doctor of Engineering, Doctor of Laws जैसी म...
UPI पर MDR का नया दौर: क्या डिजिटल भारत की रफ्तार पर लगेगा ब्रेक?
Editorial

UPI पर MDR का नया दौर: क्या डिजिटल भारत की रफ्तार पर लगेगा ब्रेक?

₹2,000 से ऊपर के चुनिंदा व्यापारी भुगतानों पर 0.4% MDR, 2 अक्टूबर के ‘नो UPI डे’ की अपील और डिजिटल अर्थव्यवस्था के भविष्य पर बड़ा सवाल लेखक: डॉ. विनायक अशोक जैन लूनियाप्रधान संपादक, SD News Agencyवरिष्ठ पत्रकार | सामाजिक विषयों पर चिंतक एवं टिप्पणीकार | समाजसेवी | उद्यमीHonorary Doctorate in Journalism & Human Rights, Legal Awareness & Social Justice भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था ने पिछले एक दशक में जिस तेजी से अपना स्वरूप बदला है, उसमें Unified Payments Interface यानी UPI की भूमिका असाधारण रही है। चाय की दुकान से लेकर बड़े शोरूम तक, सब्जी विक्रेता से लेकर टैक्सी चालक तक और छोटे कारोबारी से लेकर कॉरपोरेट संस्थानों तक—QR कोड के माध्यम से भुगतान आज भारतीय जीवन का सामान्य हिस्सा बन चुका है। लेकिन अब UPI के सामने एक नया आर्थिक और सामाजिक प्रश्न खड़ा है। 15 अक्टूबर 2026 से चुनिंदा Per...
कचरे के ढेर पर बढ़ते शहर: वैज्ञानिक प्रबंधन से ही बनेगा स्वच्छ और टिकाऊ भारत
Editorial, Opinion

कचरे के ढेर पर बढ़ते शहर: वैज्ञानिक प्रबंधन से ही बनेगा स्वच्छ और टिकाऊ भारत

डॉ. प्रियंका सौरभ   (सद्वार्ता)   भारत में तेजी से बढ़ता शहरीकरण आर्थिक विकास और रोजगार के अवसर तो बढ़ा रहा है, लेकिन इसके साथ बढ़ते ठोस अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन एक गंभीर चुनौती बन गया है। अनियोजित शहरी विस्तार, बढ़ती जनसंख्या, बदलती जीवनशैली और प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग ने शहरों में कचरे की मात्रा और विविधता दोनों को बढ़ा दिया है। अनेक शहरों में आज भी कचरा प्रबंधन ‘कलेक्ट-ट्रांसपोर्ट-डंप’ मॉडल तक सीमित है। इसके कारण खुले में कचरा फेंकने, जलाने, जल स्रोतों के प्रदूषण और लैंडफिल पर बढ़ते दबाव जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। ऐसे में भारत के सामने चुनौती केवल कचरा हटाने की नहीं, बल्कि उसे उपयोगी संसाधन में बदलने की है। कचरे की अलग-अलग श्रेणियां, अलग समाधान नगरपालिका ठोस अपशिष्ट में भोजन के अवशेष, कागज, प्लास्टिक, कांच, धातु, कपड़ा और पैकेजिंग सामग्री शामिल हो...
विज्ञापन, अखबार और जवाबदेही का सवाल
Editorial, Opinion

विज्ञापन, अखबार और जवाबदेही का सवाल

पैसे के बदले प्रकाशित सामग्री जब समाचार जैसी दिखने लगे, तब सवाल केवल विज्ञापन का नहीं, मीडिया की विश्वसनीयता का बन जाता है नई दिल्ली। (सद्वार्ता) अखबार के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हर सामग्री पाठक के मन में एक विशेष विश्वसनीयता पैदा करती है। यही वजह है कि जब किसी विवादित व्यक्ति या संस्था के पक्ष में पूरे पृष्ठ का विज्ञापन प्रकाशित होता है और उसका प्रस्तुतीकरण समाचार या तथ्यात्मक पड़ताल जैसा दिखाई देता है, तब सवाल केवल विज्ञापन और भुगतान तक सीमित नहीं रहता। मामला मीडिया की विश्वसनीयता, संपादकीय विवेक और सामाजिक जवाबदेही से भी जुड़ जाता है। 12 सितंबर 2026 को ‘द हिन्दू’ के दिल्ली, मोहाली और उत्तर भारत के संस्करणों में एक डेरा से संबंधित पूरे पृष्ठ का विज्ञापन प्रकाशित हुआ। इसी तरह का विज्ञापन ‘दैनिक भास्कर’ के दिल्ली संस्करण में प्रकाशित होने की रिपोर्ट भी सामने आई। विज्ञापन का शीर्षक था...
शुल्क की आहट और यूपीआई का भविष्य
Editorial, Opinion

शुल्क की आहट और यूपीआई का भविष्य

— डॉ. प्रियंका सौरभ   (सद्वार्ता)  अंततः अमेरिकी दबाव ने असर दिखाया—यह निष्कर्ष आकर्षक जरूर है, लेकिन 14 सितंबर की वित्त मंत्रालय की अधिसूचना को समझने के लिए थोड़ी सावधानी जरूरी है। अधिसूचना ने ₹2,000 तक के यूपीआई लेन-देन और रुपे डेबिट कार्ड भुगतान पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शुल्क लगाने से बैंकों और भुगतान-प्रणाली प्रदाताओं को रोक दिया है। परंतु ₹2,000 से अधिक के यूपीआई भुगतान पर तत्काल कोई उपभोक्ता शुल्क लागू नहीं किया गया है; अधिसूचना ने केवल बड़े लेन-देन पर भविष्य में शुल्क या एमडीआर की संभावना के लिए रास्ता खुला छोड़ा है। फिर भी चिंता वास्तविक है। क्योंकि नीतियों का असर केवल उस शब्द से नहीं समझा जाता जो अधिसूचना में लिखा है; यह भी देखना पड़ता है कि उसके बाद बाजार का व्यवहार किस दिशा में जाता है। आज शुल्क सीधे ग्राहक से न लिया जाए, कल व्यापारी से लिया जाए और परसों व्यापारी उसे वस्...
मरवाड़ी-गुजराती समाज : परंपरा, परिश्रम और राष्ट्र निर्माण की सशक्त विरासत
Editorial, Opinion

मरवाड़ी-गुजराती समाज : परंपरा, परिश्रम और राष्ट्र निर्माण की सशक्त विरासत

लेखक : डॉ. विनायक अशोक लुनियालेखक, वरिष्ठ संपर्क — SDNA | उद्यमी | शिक्षाविद् | मोटिवेशनल काउंसलर | समाजसेवीCo-Founder — Marwari Gujarati Social CouncilHonorary Doctor — Journalism & Human Rights, Legal Awareness & Social Justice भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना को समझना हो तो उन समुदायों की भूमिका को समझना आवश्यक है, जिन्होंने अपनी जन्मभूमि से बाहर निकलकर देश के विभिन्न हिस्सों को अपनी कर्मभूमि बनाया। मारवाड़ी और गुजराती समाज इसी जीवंत परंपरा के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि हैं। राजस्थान की मरुभूमि से निकलकर देश के कोने-कोने में पहुंचे मारवाड़ी समाज ने व्यापार, उद्योग, वित्त, सेवा और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से अपनी पहचान बनाई, वहीं गुजरात की धरती से निकले गुजराती समाज ने व्यापारिक दूरदृष्टि, उद्यमिता, सहकारिता, उद्योग और वैश्विक व्यावसायिक नेटवर्क के जरिए भारत की अर्थव्यवस्था को नई ...