Tuesday, November 3

Editorial

भारत के पड़ोसी देशों में कौन आगे, कौन पीछे? प्रति व्यक्ति GDP के आंकड़ों से समझिए आर्थिक तस्वीर
Business & Economy, Editorial, Natioanal, World

भारत के पड़ोसी देशों में कौन आगे, कौन पीछे? प्रति व्यक्ति GDP के आंकड़ों से समझिए आर्थिक तस्वीर

मालदीव, श्रीलंका और भूटान भारत से आगे, जबकि नेपाल, पाकिस्तान और म्यांमार पीछे; बांग्लादेश भारत के करीब किसी देश की आर्थिक स्थिति का आकलन केवल उसकी कुल अर्थव्यवस्था के आकार से नहीं किया जा सकता। यह समझना भी जरूरी है कि देश की अर्थव्यवस्था के औसत उत्पादन का प्रति व्यक्ति हिस्सा कितना है। भारत के पड़ोसी देशों के वर्ष 2024 के प्रति व्यक्ति GDP के आंकड़े क्षेत्र की आर्थिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण अंतर दिखाते हैं। यहां प्रस्तुत तुलना विश्व बैंक के वर्ष 2024 के उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित है। सभी रकम अमेरिकी डॉलर में हैं। यह ध्यान रखना जरूरी है कि प्रति व्यक्ति GDP किसी व्यक्ति की वास्तविक कमाई, औसत वेतन या उसके हाथ में आने वाली आय नहीं होती, बल्कि देश की कुल आर्थिक गतिविधियों के मूल्य को आबादी से भाग देने पर मिलने वाला औसत आंकड़ा है। भारत और पड़ोसी देशों की प्रति व्यक्ति GDP देशप्रति...
गरबा: मां दुर्गा की भक्ति या फैशन और प्रदर्शन का मंच?
Editorial

गरबा: मां दुर्गा की भक्ति या फैशन और प्रदर्शन का मंच?

जब आस्था के उत्सव में भक्ति से ज्यादा कपड़ों, ग्लैमर और आकर्षण की चर्चा होने लगे, तो परंपरा के मूल उद्देश्य पर विचार करना जरूरी हो जाता है नवरात्रि केवल नृत्य, संगीत और उत्सव का नाम नहीं, बल्कि शक्ति की आराधना, आत्मसंयम और मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का पर्व है। गरबा और डांडिया इसी भक्ति परंपरा के खूबसूरत प्रतीक हैं। दीप की लौ के चारों ओर घूमते कदम, मां की स्तुति में गूंजते गीत और सामूहिक नृत्य—इन सबमें भारतीय संस्कृति की जीवंतता दिखाई देती है। लेकिन बदलते समय के साथ एक सवाल भी तेजी से उभर रहा है: क्या कुछ आयोजनों में गरबा की पहचान भक्ति से हटकर फैशन, ग्लैमर और दिखावे तक सीमित होती जा रही है? जब भक्ति के मंच पर फैशन शो का एहसास होने लगे आज अनेक गरबा आयोजनों में पारंपरिक परिधानों के साथ आधुनिक फैशन का भी प्रभाव दिखाई देता है। आकर्षक डिजाइन, बैकलेस और डीप-नेक परिधान, चमक...
जेन-Z की हुंकार से सत्ता में बेचैनी? नेपाल-बांग्लादेश के बाद भारत में भी उभर रही नई राजनीतिक चुनौती!
Editorial, Natioanal

जेन-Z की हुंकार से सत्ता में बेचैनी? नेपाल-बांग्लादेश के बाद भारत में भी उभर रही नई राजनीतिक चुनौती!

नीट विवाद से चुनावी पारदर्शिता तक पहुंचा युवा आंदोलन; 10 अक्टूबर के जंतर-मंतर प्रदर्शन और दिल्ली की कड़ी सुरक्षा ने लोकतंत्र, जवाबदेही तथा विरोध के अधिकार पर बहस तेज की (SDNA) विशेष आलेख भारत में जेन-Z यानी नई युवा पीढ़ी का आंदोलनकारी तेवर अब केवल सोशल मीडिया की बहस नहीं रह गया है। परीक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों से लेकर चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता तक, युवा पीढ़ी जिस तरह सवाल उठा रही है, उसने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या यह असंतोष किसी व्यापक राजनीतिक आंदोलन का रूप ले सकता है? क्या भारत में भी युवा शक्ति ऐसी चुनौती बन सकती है, जैसी हाल के वर्षों में नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में देखने को मिली? 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित युवा विरोध प्रदर्शन और उसके मद्देनजर राजधानी में किए गए व्यापक सुरक्षा इंतजामों ने इस बहस को और त...
सत्ता, सरकारी मशीनरी और राजनीतिक स्वार्थ: क्या नेता व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं?
Editorial, Politics

सत्ता, सरकारी मशीनरी और राजनीतिक स्वार्थ: क्या नेता व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं?

इंदिरा गांधी के दौर से नरेंद्र मोदी सरकार तक उठते रहे सवाल; सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल जनहित में या राजनीतिक लाभ के लिए? (SDNA) विशेष वैचारिक लेख भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां सरकारें जनता के वोट से बनती हैं, संविधान सत्ता की सीमाएं निर्धारित करता है और सरकारी संस्थाओं का मूल उद्देश्य नागरिकों की सेवा करना है। लेकिन आजादी के बाद से ही समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि क्या राजनीतिक नेता अपने पद, प्रभाव और सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल जनहित के बजाय व्यक्तिगत, दलगत या चुनावी लाभ के लिए करते हैं? इस प्रश्न का उत्तर किसी एक राजनीतिक दल, प्रधानमंत्री या सरकार तक सीमित नहीं है। इसे समझने के लिए इतिहास, न्यायालयों के फैसलों, जांच आयोगों, चुनाव आयोग के नियमों और राजनीतिक आरोपों को अलग-अलग देखना आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी नेता पर आरोप लगना, उस आरोप की जांच...
पश्चिम बंगाल में TMC का संकट: ममता के सामने बिखरी पार्टी को फिर जोड़ने और राजनीतिक जमीन बचाने की चुनौती
East Zone, Editorial, West Bengal

पश्चिम बंगाल में TMC का संकट: ममता के सामने बिखरी पार्टी को फिर जोड़ने और राजनीतिक जमीन बचाने की चुनौती

कभी बंगाल की राजनीति में दबदबा रखने वाली TMC अब अंदरूनी बगावत, पार्टी के नाम-चिह्न विवाद और सत्ता परिवर्तन के बाद अस्तित्व की नई चुनौती से जूझ रही है कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का घटनाक्रम तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए एक बड़े राजनीतिक मोड़ के रूप में सामने आया है। लंबे समय तक राज्य की सत्ता पर प्रभाव रखने वाली ममता बनर्जी की पार्टी अब विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद गंभीर आंतरिक संकट का सामना कर रही है। चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर विद्रोह तेज हुआ और बड़ी संख्या में विधायकों तथा सांसदों के एक धड़े ने ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती दी। मामला अब केवल नेतृत्व की लड़ाई तक सीमित नहीं है। TMC के नाम और पारंपरिक ‘Flowers and Grass’ चुनाव चिह्न पर भी दोनों गुटों के बीच विवाद चुनाव आयोग तक पहुंच चुका है। चुनाव आयोग ने आगामी उपचुनावों के लिए दोनों गुटों को फिलहाल पु...
CEC ज्ञानेश कुमार पर सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का क्या मतलब? इस्तीफे की मांग से लेकर SIR विवाद तक समझिए पूरा मामला
Editorial, Natioanal

CEC ज्ञानेश कुमार पर सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का क्या मतलब? इस्तीफे की मांग से लेकर SIR विवाद तक समझिए पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल निलंबन से इनकार किया, लेकिन केंद्र और चुनाव आयोग से एक सप्ताह में जवाब तलब; क्या यह सिर्फ नोटिस है या चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की बड़ी कानूनी जांच की शुरुआत? नई दिल्ली | SDNA मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर पिछले कुछ समय से राजनीतिक माहौल लगातार गर्म है। विपक्षी दलों की ओर से उनके इस्तीफे की मांग, निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल और मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चल रहे विवाद के बीच अब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। 5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने CEC ज्ञानेश कुमार से जुड़े मामले में निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। हालांकि, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने इस स्तर पर ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने या उनके कामकाज पर रोक लगाने का अंतरिम आदेश देने से इनकार किया...
मतदाता सूची में नाम कटने का डर: क्या एक बार दर्ज नाम दोबारा हटाया जा सकता है? जानिए नियम, प्रक्रिया और बचाव के उपाय
Editorial

मतदाता सूची में नाम कटने का डर: क्या एक बार दर्ज नाम दोबारा हटाया जा सकता है? जानिए नियम, प्रक्रिया और बचाव के उपाय

विपक्ष के ‘वोट चोरी’ के आरोपों के बीच मतदाताओं के मन में कई सवाल, जानिए क्या कहता है निर्वाचन आयोग का नियम देश में मतदाता सूची को लेकर एक बार फिर बहस तेज है। एक तरफ विपक्षी दल मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी और ‘वोट चोरी’ जैसे गंभीर आरोप लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आम मतदाताओं के बीच यह चिंता दिखाई दे रही है कि कहीं उनका नाम मतदाता सूची से हटा न दिया जाए। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है—क्या मतदाता सूची में एक बार नाम दर्ज होने के बाद उसे हटाया जा सकता है? अगर हां, तो किन परिस्थितियों में? और अगर किसी मतदाता का नाम गलती से हटा दिया जाए तो वह क्या कर सकता है? इस सवाल का जवाब समझने के लिए चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित प्रक्रिया को जानना जरूरी है। क्या मतदाता सूची में दर्ज नाम कभी हटाया जा सकता है? हां, किसी व्यक्ति का नाम Electoral Roll यानी मतदाता सूची से हटाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए...
गांधी जयंती विशेष: बदलत्या भारतात गांधी विचारांची नव्याने गरज
Editorial

गांधी जयंती विशेष: बदलत्या भारतात गांधी विचारांची नव्याने गरज

सत्य, अहिंसा, स्वावलंबन और सामाजिक उत्तरदायित्व आज भी समाज को दे सकते हैं नई दिशा लेखक : डॉ. विनायक अशोक जैन लुनिया (SDNA) नई दिल्ली/उज्जैन। 2 अक्टूबर केवल महात्मा गांधी की जयंती का अवसर नहीं, बल्कि उन मूल्यों को याद करने का दिन है, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक सामाजिक चेतना से जोड़ा। गांधीजी के लिए आजादी का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं था, बल्कि ऐसा समाज बनाना था, जहां व्यक्ति सम्मान, आत्मनिर्भरता और सामाजिक सद्भाव के साथ जीवन जी सके। आज देश तकनीक, अर्थव्यवस्था और संचार के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। परिस्थितियां गांधीजी के समय से काफी अलग हैं, लेकिन सत्य, अहिंसा, स्वावलंबन, स्वच्छता और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे मूल्यों की प्रासंगिकता पर आज भी विचार किया जा सकता है। सत्य और अहिंसा से संवाद की संस्कृति तक गांधीजी के सार्वजनिक जीवन का आधार सत्य ...
मानद डॉक्टरेट : प्रतिभा, प्रतिष्ठा और समाज के सम्मान की विश्वविद्यालयीय मुहर
Editorial

मानद डॉक्टरेट : प्रतिभा, प्रतिष्ठा और समाज के सम्मान की विश्वविद्यालयीय मुहर

जब विश्वविद्यालय की डिग्री केवल अकादमिक उपलब्धि नहीं, बल्कि जीवनभर के योगदान को सम्मान देती है विश्वविद्यालय की डिग्री सामान्यतः वर्षों की पढ़ाई, शोध और अकादमिक अनुशासन के बाद प्राप्त होती है। लेकिन मानद डॉक्टरेट इससे अलग एक ऐसी प्रतिष्ठित उपाधि है, जिसे विश्वविद्यालय किसी व्यक्ति के असाधारण योगदान, उपलब्धियों और समाज पर उसके व्यापक प्रभाव के सम्मान में प्रदान करता है। विज्ञान, शिक्षा, कला, साहित्य, संगीत, उद्योग, सार्वजनिक जीवन और सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले अनेक भारतीयों को देश-विदेश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों ने इस सम्मान से नवाजा है। मानद डॉक्टरेट की सूची पर नजर डालें तो एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। इसमें वैज्ञानिक और राष्ट्रनायक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से लेकर संगीत की दुनिया की महान हस्तियों, बॉलीवुड के दिग्गज कलाकारों, उद्योग जगत के नेतृत्वकर्ताओं और ...
संगीत: एनर्जी, माइंडसेट और सफलता की राह में एक पावर बूस्टर
Editorial

संगीत: एनर्जी, माइंडसेट और सफलता की राह में एक पावर बूस्टर

संगीत केवल सुनाई देने वाली ध्वनियों का मेल नहीं है, यह मन की ऊर्जा को दिशा देने वाला एक शक्तिशाली माध्यम भी बन सकता है। जब जीवन में तनाव बढ़ता है, लक्ष्य कठिन दिखाई देने लगते हैं या काम के प्रति उत्साह कम होने लगता है, तब पसंदीदा संगीत मनोदशा को बदलने और दोबारा सक्रिय होने में मदद कर सकता है। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में सक्सेस माइंडसेट यानी सफलता के लिए सकारात्मक और लक्ष्य-केंद्रित मानसिकता विकसित करना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी संदर्भ में संगीत को एक ऐसे साधन के रूप में देखा जा सकता है, जो व्यक्ति को मानसिक रूप से तैयार करने, ऊर्जा महसूस करने और काम पर ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकता है। संगीत और माइंडसेट का कनेक्शन हमारे आसपास की आवाजें और संगीत हमारी भावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं। तेज और ऊर्जावान संगीत कई लोगों में उत्साह और सक्रियता की भावना पैदा करता है, जबकि धीम...