Monday, November 2

टूटे रिश्ते जोड़ना ही सच्चा धर्म, संवत्सरी पर मिला मैत्री का संदेश

साध्वी उपेन्द्रयशाश्रीजी ने कहा—अहंकार, क्रोध और वैर-विरोध छोड़कर सभी जीवों से मैत्री स्थापित करना ही संवत्सरी की वास्तविक साधना

उज्जैन | (सद्वार्ता)

आचार्य श्री विजयहीर सूरिश्वरजी बड़ा उपाश्रय एवं श्री केसरियानाथ खाराकुआं मंदिर में संवत्सरी पर्व श्रद्धा, आत्मचिंतन और क्षमाभाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर साध्वी उपेन्द्रयशाश्रीजी म.सा. ने संवत्सरी को विश्व मैत्री का पवित्र पर्व बताते हुए कहा कि यह पर्व रिश्तों में आई दूरियों और मनमुटाव की दीवारों को हटाकर एक-दूसरे के करीब आने की प्रेरणा देता है।

साध्वीजी ने कहा कि भाई-भाई, सास-बहू, देवरानी-जेठानी, पिता-पुत्र अथवा पड़ोसियों के बीच यदि किसी कारण से वैर-विरोध या मनमुटाव उत्पन्न हो गया है, तो संवत्सरी का सच्चा संदेश उस दूरी को समाप्त करना है। केवल पर्व मनाने से धर्म की पूर्णता नहीं होती, बल्कि मन से अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और प्रतिशोध की भावना को दूर करना ही इसकी वास्तविक साधना है।

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उन्होंने कहा कि किसी अपरिचित व्यक्ति से क्षमा मांगना आसान हो सकता है, लेकिन जिन दो व्यक्तियों के बीच वर्षों से विवाद चल रहा हो या न्यायालयीन प्रकरण तक पहुंच गया हो, उनका एक-दूसरे से क्षमायाचना करना बड़ी तपस्या के समान है। धर्म की वास्तविक नींव टूटे हुए दिलों को जोड़ने में है।

बाहरी चढ़ावे से अधिक निर्मल मन जरूरी

साध्वीजी ने कहा कि भगवान को हमारे बाहरी चढ़ावे से अधिक निर्मल मन चाहिए। लड्डू, फल, मिठाइयां अथवा धन अर्पित करने के साथ यदि मन में अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और वैर-विरोध बना रहे, तो आत्मशुद्धि का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

उन्होंने कहा कि संवत्सरी आत्मावलोकन का अवसर है। यह पर्व व्यक्ति को अपने भीतर झांकने, अपनी गलतियों और दोषों को स्वीकार करने तथा सभी जीवों के प्रति मैत्री एवं सद्भाव की भावना विकसित करने की प्रेरणा देता है।

चैत्य परिपाटी में श्रद्धालुओं ने किए मंदिर दर्शन

संवत्सरी पर्व के अवसर पर समाजजनों द्वारा चैत्य परिपाटी का आयोजन भी किया गया। इसमें बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। श्रद्धालुओं ने 8 से 10 जिनालयों में पहुंचकर दर्शन-वंदन किए।

विभिन्न मंदिरों में श्रद्धालुओं ने भगवान के दर्शन, पूजन एवं वंदन कर आत्मकल्याण तथा विश्व मैत्री की भावना के साथ संवत्सरी पर्व मनाया।

कार्यक्रम के अंत में समाजजनों ने परस्पर ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ कहकर जाने-अनजाने में हुई भूलों के लिए एक-दूसरे से क्षमा मांगी। साथ ही सभी के प्रति मैत्री, सद्भाव और आत्मीयता की भावना व्यक्त की।