Monday, November 2

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रेखा गुप्ता का ‘राम’ वाला वायरल वीडियो: जुबान फिसली या AI का खेल? सवालों के घेरे में सच्चाई
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रेखा गुप्ता का ‘राम’ वाला वायरल वीडियो: जुबान फिसली या AI का खेल? सवालों के घेरे में सच्चाई

रामलीला के मंच से कथित बयान पर विवाद, मुख्यमंत्री ने वीडियो को AI-निर्मित बताया; निष्पक्ष जाँच के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी नई दिल्ली | SDNA विशेष विश्लेषण दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का रामलीला कार्यक्रम से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। वीडियो में कथित तौर पर उनके मुंह से ‘रावण’ की जगह ‘राम’ शब्द निकलता सुनाई देता है। इस क्लिप को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। एक ओर आम आदमी पार्टी के नेताओं ने इसे धार्मिक भावनाओं से जुड़ा गंभीर मामला बताया है, तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने वीडियो को AI से तैयार किया गया बताया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वीडियो की वास्तविकता क्या है और इस विवाद की निष्पक्ष जाँच कैसे होनी चाहिए? क्या है पूरा मामला? मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह विवाद 13 अक्टूबर की रात दिल्ली के आजादपुर स्थित केवल...
जनसेवा या धन-संपत्ति का खेल? भ्रष्टाचार के दलदल में फंसती व्यवस्था और टूटता जनता का विश्वास
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जनसेवा या धन-संपत्ति का खेल? भ्रष्टाचार के दलदल में फंसती व्यवस्था और टूटता जनता का विश्वास

पढ़ाई से पद तक, पद से सत्ता तक और सत्ता से अकूत संपत्ति तक का सफर! आखिर जनकल्याण के नाम पर मिलने वाले अधिकारों का इस्तेमाल किसके हित में हो रहा है? लेख | भ्रष्टाचार, नैतिकता और जनसेवा पर एक विचारणीय विमर्श आज शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो, जब समाचार पत्रों, टेलीविजन चैनलों और न्यूज पोर्टलों पर भ्रष्टाचार से जुड़ी कोई बड़ी खबर सामने न आती हो। कहीं सरकारी अधिकारी पर रिश्वत लेने का आरोप लगता है, कहीं किसी सरकारी ठेके में अनियमितताओं की चर्चा होती है, तो कहीं किसी प्रभावशाली व्यक्ति की संपत्ति और आय के स्रोतों को लेकर सवाल उठते हैं। इन खबरों को पढ़ते, देखते और सुनते हुए आम नागरिक के मन में एक स्वाभाविक प्रश्न पैदा होता है—आखिर व्यवस्था में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी क्यों होती जा रही हैं? जिस व्यवस्था का उद्देश्य जनता की सेवा करना, विकास को गति देना और समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुवि...
64 खाने, 32 मोहरे और राजनीति का शतरंज
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64 खाने, 32 मोहरे और राजनीति का शतरंज

सत्ता, रणनीति और समाज को समझने का एक रूपक — डॉ. विनायक अशोक लुनिया शतरंज की बिसात पर कुल 64 खाने होते हैं और दो पक्षों के बीच कुल 32 मोहरे। पहली नजर में यह काले और सफेद खानों पर चलने वाले राजा, रानी, हाथी, ऊंट, घोड़े और प्यादों का खेल दिखाई देता है। लेकिन यदि शतरंज को राजनीति की नजर से देखा जाए, तो यही बिसात सत्ता, रणनीति, संघर्ष, सहयोग और शक्ति-संतुलन का एक दिलचस्प रूपक बन जाती है। शतरंज की खासियत यह है कि इसमें कोई भी चाल अकेली नहीं होती। एक चाल के पीछे अगली चाल की संभावना छिपी होती है। एक मोहरे की स्थिति दूसरे मोहरे की ताकत या कमजोरी बदल सकती है और कभी-कभी सबसे छोटा प्यादा भी पूरी बाजी का रुख बदल देता है। राजनीति में भी परिस्थितियां कुछ ऐसी ही होती हैं—हर निर्णय का असर आगे की रणनीति पर पड़ता है और सत्ता के समीकरण लगातार बदलते रहते हैं। दिलचस्प बात यह है कि शतरंज और सामाजिक-र...