Wednesday, November 4

Opinion

शुल्क की आहट और यूपीआई का भविष्य
Editorial, Opinion

शुल्क की आहट और यूपीआई का भविष्य

— डॉ. प्रियंका सौरभ   (सद्वार्ता)  अंततः अमेरिकी दबाव ने असर दिखाया—यह निष्कर्ष आकर्षक जरूर है, लेकिन 14 सितंबर की वित्त मंत्रालय की अधिसूचना को समझने के लिए थोड़ी सावधानी जरूरी है। अधिसूचना ने ₹2,000 तक के यूपीआई लेन-देन और रुपे डेबिट कार्ड भुगतान पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शुल्क लगाने से बैंकों और भुगतान-प्रणाली प्रदाताओं को रोक दिया है। परंतु ₹2,000 से अधिक के यूपीआई भुगतान पर तत्काल कोई उपभोक्ता शुल्क लागू नहीं किया गया है; अधिसूचना ने केवल बड़े लेन-देन पर भविष्य में शुल्क या एमडीआर की संभावना के लिए रास्ता खुला छोड़ा है। फिर भी चिंता वास्तविक है। क्योंकि नीतियों का असर केवल उस शब्द से नहीं समझा जाता जो अधिसूचना में लिखा है; यह भी देखना पड़ता है कि उसके बाद बाजार का व्यवहार किस दिशा में जाता है। आज शुल्क सीधे ग्राहक से न लिया जाए, कल व्यापारी से लिया जाए और परसों व्यापारी उसे वस्...
मनी लॉन्ड्रिंग: अपराध की काली कमाई को सफेद करने का खेल
Opinion

मनी लॉन्ड्रिंग: अपराध की काली कमाई को सफेद करने का खेल

धनशोधन संगठित अपराध, भ्रष्टाचार और अवैध गतिविधियों के लिए वित्तीय आधार; मजबूत कानून और पारदर्शी वित्तीय व्यवस्था की जरूरत (SDNA) | विचार लेख डॉ. सत्यवान सौरभ मनी लॉन्ड्रिंग यानी धनशोधन आज केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि संगठित अपराध, भ्रष्टाचार, मादक पदार्थों की तस्करी, आतंकवाद और अवैध व्यापार को आर्थिक मजबूती देने वाली गंभीर चुनौती बन चुका है। अपराध से अर्जित धन के वास्तविक स्रोत को छिपाकर उसे वैध आय या निवेश के रूप में प्रस्तुत करना ही धनशोधन की मूल प्रक्रिया है। आधुनिक वित्तीय व्यवस्था के विस्तार के साथ इस अपराध के तौर-तरीके भी लगातार जटिल होते जा रहे हैं। प्लेसमेंट, लेयरिंग और इंटीग्रेशन: धनशोधन के तीन प्रमुख चरण मनी लॉन्ड्रिंग की प्रक्रिया को सामान्यतः तीन प्रमुख चरणों में समझा जाता है। पहले चरण को प्लेसमेंट (Placement) कहा जाता है, जिसमें अपराध से प्राप्त धन को वित्तीय व...
बदलता भारत, बनता भारत
Opinion

बदलता भारत, बनता भारत

हम जिस भारत के रूप में उभरे हैं और जिस भारत की हम अभी भी तलाश कर रहे हैं – डॉ. प्रियंका सौरभ नई दिल्ली। प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस हमें अपने राष्ट्र के अतीत पर चिंतन करने और भविष्य पर विचार करने का अवसर देता है। स्वतंत्रता के 80 वर्षों में भारत में आए बदलाव केवल अर्थव्यवस्था, शहरों और तकनीक तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आम भारतीयों की आकांक्षाओं, आत्मविश्वास और सोच में भी व्यापक परिवर्तन आया है। आज का भारत 1947 में औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुए भारत से काफी अलग है। आर्थिक विकास से बदली तस्वीर स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दशकों में संसाधनों की कमी, सीमित अवसर और बड़ी आबादी की मूलभूत जरूरतों को पूरा करना बड़ी चुनौती थी। आज भारत दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में शामिल है। आधुनिक उद्योग, विकसित होती आधारभूत संरचना, उद्यमिता और महत्वाकांक्षी युवा पीढ़ी देश की नई पहचान बन चुके हैं। सड़क, ह...
मरवाड़ी-गुजराती समाज : परंपरा, परिश्रम और राष्ट्र निर्माण की सशक्त विरासत
Editorial, Opinion

मरवाड़ी-गुजराती समाज : परंपरा, परिश्रम और राष्ट्र निर्माण की सशक्त विरासत

लेखक : डॉ. विनायक अशोक लुनियालेखक, वरिष्ठ संपर्क — SDNA | उद्यमी | शिक्षाविद् | मोटिवेशनल काउंसलर | समाजसेवीCo-Founder — Marwari Gujarati Social CouncilHonorary Doctor — Journalism & Human Rights, Legal Awareness & Social Justice भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना को समझना हो तो उन समुदायों की भूमिका को समझना आवश्यक है, जिन्होंने अपनी जन्मभूमि से बाहर निकलकर देश के विभिन्न हिस्सों को अपनी कर्मभूमि बनाया। मारवाड़ी और गुजराती समाज इसी जीवंत परंपरा के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि हैं। राजस्थान की मरुभूमि से निकलकर देश के कोने-कोने में पहुंचे मारवाड़ी समाज ने व्यापार, उद्योग, वित्त, सेवा और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से अपनी पहचान बनाई, वहीं गुजरात की धरती से निकले गुजराती समाज ने व्यापारिक दूरदृष्टि, उद्यमिता, सहकारिता, उद्योग और वैश्विक व्यावसायिक नेटवर्क के जरिए भारत की अर्थव्यवस्था को नई ...