Tuesday, November 3

Opinion

सोशल मीडिया के दौर में सूचना युद्ध: राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने उभरती नई चुनौती
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सोशल मीडिया के दौर में सूचना युद्ध: राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने उभरती नई चुनौती

फर्जी खबरों से डीपफेक तक—डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैलने वाली भ्रामक सूचनाएं सामाजिक विश्वास, जनमत और संकट प्रबंधन को प्रभावित कर सकती हैं (SDNA) विशेष लेख। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सूचना को अभूतपूर्व गति प्रदान की है। फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यम से कोई भी सूचना कुछ ही क्षणों में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकती है। यह सुविधा आधुनिक समाज के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसी तेजी ने सूचना युद्ध को भी राष्ट्रीय सुरक्षा की नई चुनौती के रूप में सामने ला दिया है। सूचना युद्ध का व्यापक अर्थ ऐसी सूचनाओं के रणनीतिक इस्तेमाल से है, जिनके जरिए लोगों की धारणा, भावनाओं, विश्वास और निर्णयों को प्रभावित करने का प्रयास किया जाए। इसमें झूठी खबरें, अधूरी जानकारी, पुराने फोटो-वीडियो को नई घटना से जोड़ना, वास्तविक सूचना को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत करना और किसी खा...
विज्ञापन बंद हों, नशे के जाल से बचें युवा
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विज्ञापन बंद हों, नशे के जाल से बचें युवा

- डॉ. प्रियंका सौरभ (SDNA) युवाओं में नशे की रोकथाम के लिए सेलिब्रिटी और सार्वजनिक व्यक्तित्वों का नैतिक दायित्व सेलिब्रिटी और सार्वजनिक व्यक्तित्व समाज में एक विशेष प्रभाव रखते हैं। उनके शब्दों, व्यवहार और जीवनशैली को मीडिया तथा सोशल मीडिया के माध्यम से व्यापक रूप से लोगों तक पहुँचाया जाता है, जिससे वे विशेषकर युवाओं के लिए प्रभावशाली आदर्श बन जाते हैं। यह लोकप्रियता केवल अवसर ही नहीं देती, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी भी पैदा करती है। नशे की लत आज स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक समरसता के लिए गंभीर चुनौती है। सामाजिक प्रभाव का अर्थ दूसरों के विचारों, दृष्टिकोण और व्यवहार को प्रभावित करने की क्षमता से है। फिल्म कलाकारों, खिलाड़ियों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, अधिकारियों और अन्य सार्वजनिक व्यक्तित्वों का प्रभाव मनोरंजन या प्रशासन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि तब नैतिक जिम्मेदारी का रूप ले लेता...
खेतों के नीचे सूखता भारत
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खेतों के नीचे सूखता भारत

(भूजल संकट: भारतीय कृषि के सामने गंभीर चुनौती)  - डॉ. सत्यवान सौरभ भारत की कृषि उपलब्धियों की चमक के पीछे एक गंभीर सच्चाई छिपी है—भूजल का तेज़ी से ह्रास। देश की सिंचाई का 78 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भूजल पर निर्भर है और कृषि क्षेत्र भूजल निकासी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा अपने पास समेटे हुए है।  पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे कृषि प्रधान राज्यों में भूजल निकासी वार्षिक रीचार्ज से कहीं अधिक हो गई है; पंजाब में तो यह दर 152 प्रतिशत तक पहुँच गई है।  यह स्थिति न केवल दीर्घकालिक कृषि स्थिरता को खतरे में डाल रही है, बल्कि ग्रामीण असमानता, ऊर्जा की बढ़ती मांग और पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण जैसे गंभीर परिणाम भी पैदा कर रही है।  इस संकट की जड़ें संरचनात्मक नीतियों और प्रोत्साहनों में निहित हैं। हरित क्रांति के बाद से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और सरकारी खरीद की गारंटी न...
हनुमान अंश पर विरोध से आगे उठे सवाल, डिजिटल मनोरंजन की समान कसौटी पर हो बहस
Opinion

हनुमान अंश पर विरोध से आगे उठे सवाल, डिजिटल मनोरंजन की समान कसौटी पर हो बहस

धार्मिक भावनाओं से जुड़े विषयों पर विरोध के साथ अश्लीलता, हिंसा और आपत्तिजनक डिजिटल सामग्री के सामाजिक प्रभाव पर भी हो गंभीर चर्चा नई दिल्ली, 24 सितंबर। (SDNA)फिल्मों और वेब सीरीज को लेकर समाज में होने वाली बहस अब केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रह गई है। धर्म, संस्कृति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक मूल्यों और बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे मुद्दे भी इसके केंद्र में आ गए हैं। हाल में ‘हनुमान अंश’ फिल्म को लेकर सामने आए विरोध ने एक व्यापक सवाल खड़ा किया है—क्या मनोरंजन सामग्री के मूल्यांकन के लिए समाज में समान कसौटी अपनाई जा रही है? धार्मिक या सांस्कृतिक विषयों वाली किसी फिल्म से किसी वर्ग को आपत्ति हो सकती है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध तथा सार्वजनिक विमर्श उसका हिस्सा हैं। लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि अश्लीलता, अत्यधिक हिंसा, गाली-गलौज, नशे, अपराध ...
पत्रकारिता की कसौटी: सवाल सत्ता से भी, विपक्ष से भी
Natioanal, Opinion

पत्रकारिता की कसौटी: सवाल सत्ता से भी, विपक्ष से भी

खबर और प्रचार के बीच अंतर तय करती है पत्रकार की कार्यपद्धति SDNA विशेष लेख | नई दिल्ली सूचना के बढ़ते विस्तार और सोशल मीडिया के प्रभाव के दौर में यह सवाल पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि पत्रकारिता और प्रचार के बीच अंतर कैसे पहचाना जाए। आज हर व्यक्ति अपनी बात सार्वजनिक मंच पर रख सकता है, समाचार के स्रोत पहले से कहीं अधिक हैं और राजनीतिक तथा वैचारिक बहसें लगातार तेज हो रही हैं। ऐसे वातावरण में पत्रकारिता की विश्वसनीयता केवल खबर देने से नहीं, बल्कि खबर की जांच-पड़ताल और उसके पीछे अपनाई गई प्रक्रिया से तय होती है। पत्रकारिता का मूल दायित्व किसी राजनीतिक दल, सरकार या विपक्ष के पक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े सवालों को तथ्यों के आधार पर सामने रखना है। सरकार कोई नीति लागू करती है तो उसके उद्देश्य, आर्थिक प्रभाव, संभावित लाभ और चुनौतियों पर सवाल होना चाहिए। वही...
कर्ज की वसूली हो, लेकिन कानून की हद में
Legal Awareness, Opinion

कर्ज की वसूली हो, लेकिन कानून की हद में

सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण फैसला : वाहन जब्ती में मनमानी, बलप्रयोग और अनुचित समय पर कार्रवाई पर कड़ा संदेश — डॉ. सत्यवान सौरभ (SDNA) कर्ज लेना एक आर्थिक अनुबंध है। कर्ज की राशि निर्धारित समय पर वापस न मिलने की स्थिति में बैंक या वित्तीय संस्था को अपनी बकाया राशि वसूलने का अधिकार है। लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। कर्ज की वसूली के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया कानून, ऋण समझौते और भारतीय रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों के अनुरूप होनी चाहिए। किसी व्यक्ति के ऊपर कर्ज बकाया होने का अर्थ यह नहीं है कि वित्तीय संस्था उसके साथ बलपूर्वक, अपमानजनक या मनमाने तरीके से व्यवहार कर सकती है। सर्वोच्च न्यायालय का हालिया फैसला इसी महत्वपूर्ण सिद्धांत को रेखांकित करता है। मामला उत्तर प्रदेश के हरि दत्ता शर्मा से संबंधित है। उन्होंने वर्ष 2019 में टाटा एसएफसी 407 ट्रक खरीदने के लिए चोलामंडलम इन्व...
दीपक की लौ और हमारी सांस्कृतिक संवेदना
Opinion

दीपक की लौ और हमारी सांस्कृतिक संवेदना

- डॉ. सत्यवान सौरभ आप दीप जलाते हैं या नहीं जलाते, यह आपका व्यक्तिगत निर्णय है। किसी धार्मिक परंपरा को मानना, उससे दूरी रखना या अपने तरीके से उसका पालन करना—लोकतांत्रिक समाज में यह व्यक्ति की स्वतंत्रता का विषय है। लेकिन जब व्यक्तिगत पसंद या राजनीतिक असहमति की अभिव्यक्ति किसी धार्मिक प्रतीक और सांस्कृतिक परंपरा के सार्वजनिक उपहास तक पहुँच जाती है, तब सवाल केवल एक दीपक का नहीं रह जाता। सवाल यह होता है कि असहमति जताते समय हम दूसरों की आस्था और सांस्कृतिक संवेदनाओं का कितना सम्मान करते हैं। भारतीय संस्कृति में दीपक का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। दीपावली का पूरा भाव ही प्रकाश, आशा और अंधकार पर प्रकाश की विजय से जुड़ा है। घर, मंदिर और अनेक शुभ अवसरों पर दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। संध्या समय दीप जलाने की परंपरा भी अनेक भारतीय परिवारों में आज तक दिखाई देती ...
64 खाने, 32 मोहरे और राजनीति का शतरंज
Breaking news, Opinion

64 खाने, 32 मोहरे और राजनीति का शतरंज

सत्ता, रणनीति और समाज को समझने का एक रूपक — डॉ. विनायक अशोक लुनिया शतरंज की बिसात पर कुल 64 खाने होते हैं और दो पक्षों के बीच कुल 32 मोहरे। पहली नजर में यह काले और सफेद खानों पर चलने वाले राजा, रानी, हाथी, ऊंट, घोड़े और प्यादों का खेल दिखाई देता है। लेकिन यदि शतरंज को राजनीति की नजर से देखा जाए, तो यही बिसात सत्ता, रणनीति, संघर्ष, सहयोग और शक्ति-संतुलन का एक दिलचस्प रूपक बन जाती है। शतरंज की खासियत यह है कि इसमें कोई भी चाल अकेली नहीं होती। एक चाल के पीछे अगली चाल की संभावना छिपी होती है। एक मोहरे की स्थिति दूसरे मोहरे की ताकत या कमजोरी बदल सकती है और कभी-कभी सबसे छोटा प्यादा भी पूरी बाजी का रुख बदल देता है। राजनीति में भी परिस्थितियां कुछ ऐसी ही होती हैं—हर निर्णय का असर आगे की रणनीति पर पड़ता है और सत्ता के समीकरण लगातार बदलते रहते हैं। दिलचस्प बात यह है कि शतरंज और सामाजिक-र...
कचरे के ढेर पर बढ़ते शहर: वैज्ञानिक प्रबंधन से ही बनेगा स्वच्छ और टिकाऊ भारत
Editorial, Opinion

कचरे के ढेर पर बढ़ते शहर: वैज्ञानिक प्रबंधन से ही बनेगा स्वच्छ और टिकाऊ भारत

डॉ. प्रियंका सौरभ   (सद्वार्ता)   भारत में तेजी से बढ़ता शहरीकरण आर्थिक विकास और रोजगार के अवसर तो बढ़ा रहा है, लेकिन इसके साथ बढ़ते ठोस अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन एक गंभीर चुनौती बन गया है। अनियोजित शहरी विस्तार, बढ़ती जनसंख्या, बदलती जीवनशैली और प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग ने शहरों में कचरे की मात्रा और विविधता दोनों को बढ़ा दिया है। अनेक शहरों में आज भी कचरा प्रबंधन ‘कलेक्ट-ट्रांसपोर्ट-डंप’ मॉडल तक सीमित है। इसके कारण खुले में कचरा फेंकने, जलाने, जल स्रोतों के प्रदूषण और लैंडफिल पर बढ़ते दबाव जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। ऐसे में भारत के सामने चुनौती केवल कचरा हटाने की नहीं, बल्कि उसे उपयोगी संसाधन में बदलने की है। कचरे की अलग-अलग श्रेणियां, अलग समाधान नगरपालिका ठोस अपशिष्ट में भोजन के अवशेष, कागज, प्लास्टिक, कांच, धातु, कपड़ा और पैकेजिंग सामग्री शामिल हो...
विज्ञापन, अखबार और जवाबदेही का सवाल
Editorial, Opinion

विज्ञापन, अखबार और जवाबदेही का सवाल

पैसे के बदले प्रकाशित सामग्री जब समाचार जैसी दिखने लगे, तब सवाल केवल विज्ञापन का नहीं, मीडिया की विश्वसनीयता का बन जाता है नई दिल्ली। (सद्वार्ता) अखबार के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हर सामग्री पाठक के मन में एक विशेष विश्वसनीयता पैदा करती है। यही वजह है कि जब किसी विवादित व्यक्ति या संस्था के पक्ष में पूरे पृष्ठ का विज्ञापन प्रकाशित होता है और उसका प्रस्तुतीकरण समाचार या तथ्यात्मक पड़ताल जैसा दिखाई देता है, तब सवाल केवल विज्ञापन और भुगतान तक सीमित नहीं रहता। मामला मीडिया की विश्वसनीयता, संपादकीय विवेक और सामाजिक जवाबदेही से भी जुड़ जाता है। 12 सितंबर 2026 को ‘द हिन्दू’ के दिल्ली, मोहाली और उत्तर भारत के संस्करणों में एक डेरा से संबंधित पूरे पृष्ठ का विज्ञापन प्रकाशित हुआ। इसी तरह का विज्ञापन ‘दैनिक भास्कर’ के दिल्ली संस्करण में प्रकाशित होने की रिपोर्ट भी सामने आई। विज्ञापन का शीर्षक था...