Tuesday, November 3

Opinion

जब आंदोलन करने वाले ही बन जाते हैं मजाक का विषय, सवालों के घेरे में समाज की सोच
Natioanal, Opinion

जब आंदोलन करने वाले ही बन जाते हैं मजाक का विषय, सवालों के घेरे में समाज की सोच

(SDNA) नई दिल्ली। देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग मुद्दों को लेकर हो रहे आंदोलनों के बीच एक ऐसी तस्वीर भी सामने आती है, जहां अपने अधिकारों और मांगों के लिए आवाज उठाने वाले कुछ प्रदर्शनकारी उपहास और आलोचना का केंद्र बन जाते हैं। राह चलते लोग उनका मजाक उड़ाते हैं, पुलिस और मीडिया के व्यवहार पर सवाल उठते हैं तथा सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। ऐसे आंदोलनकर्ताओं को अक्सर “बुरा आंदोलनकर्ता” कहकर संबोधित किया जाता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि किसी आंदोलन में शामिल व्यक्ति को इस श्रेणी में रखने का आधार क्या है? क्या उसके विरोध का तरीका, उसकी भाषा या उसकी असहज उपस्थिति ही उसे उपहास का पात्र बना देती है? लोकतंत्र में आंदोलन केवल विरोध दर्ज कराने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं, असहमति और अधिकारों को सामने लाने का एक महत्वपूर्ण जरिया भी हैं। हर प्रदर्शन व्यवस्थ...
कौन बोला, कौन बोला? आंदोलनों के बीच गूंजते व्यंग्य और सत्ता से सवाल करते नारे
Opinion

कौन बोला, कौन बोला? आंदोलनों के बीच गूंजते व्यंग्य और सत्ता से सवाल करते नारे

हंसी-मजाक के अंदाज में लोकतंत्र, पुलिस व्यवस्था और प्रदर्शनकारियों की स्थिति पर तीखे कटाक्ष नई दिल्ली। देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे आंदोलनों के बीच नारों और व्यंग्यात्मक टिप्पणियों का एक अलग ही रंग देखने को मिल रहा है। कहीं प्रदर्शनकारी व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं, तो कहीं पुलिस की कार्रवाई, राजनीतिक बयानबाजी और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर तंज कसे जा रहे हैं। इन टिप्पणियों में हास्य के साथ-साथ समाज और व्यवस्था की विडंबनाओं की झलक भी दिखाई देती है। आंदोलनों के दौरान सामने आए कुछ चर्चित व्यंग्यात्मक संवादों ने लोगों का ध्यान खींचा है। किसी ने कहा, “लोग हमेशा मन की बात सुनते रहेंगे, तो मन की बात बोलेंगे कब?” तो किसी ने प्रदर्शन को शारीरिक व्यायाम से जोड़ते हुए टिप्पणी की, “पहले घर पर कार्डियो करता था, अब प्रोटेस्ट में करता हूं।” पुलिस की भारी तैनाती पर कटाक्ष करते हुए एक टिप्प...
महंगाई की मार या बदलती खरीदारी की आदतें? जॉकी, डॉलर और रूपा के अंडरवियर कारोबार पर दबाव
Business & Economy, Opinion

महंगाई की मार या बदलती खरीदारी की आदतें? जॉकी, डॉलर और रूपा के अंडरवियर कारोबार पर दबाव

(SDNA) नई दिल्ली। देश में बढ़ती महंगाई और बदलते उपभोक्ता व्यवहार का असर अब इनरवियर बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। कभी नियमित मांग वाले इस क्षेत्र में जॉकी, डॉलर और रूपा जैसे प्रमुख ब्रांडों की बिक्री में गिरावट की खबरों ने उद्योग जगत का ध्यान खींचा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या आम लोगों ने खर्चों में कटौती करते हुए अंडरवियर जैसी रोजमर्रा की जरूरतों की खरीदारी भी टालनी शुरू कर दी है? महंगाई से सीमित हुआ खर्च का बजट घरेलू बजट पर बढ़ते दबाव के कारण उपभोक्ता अब जरूरी और गैर-जरूरी खर्चों के बीच अधिक सावधानी से संतुलन बना रहे हैं। खाद्य पदार्थों, आवास, परिवहन और अन्य आवश्यक वस्तुओं पर खर्च बढ़ने से कपड़ों की खरीदारी प्रभावित हो सकती है। ऐसे हालात में लोग पुराने इनरवियर का इस्तेमाल पहले से अधिक समय तक करने या नई खरीदारी को कुछ समय के लिए टालने का विकल्प अपना सकते हैं। ऑनलाइन छूट ने ...
लोकतंत्र का असली अर्थ क्या है? अधिकार, अभिव्यक्ति और जवाबदेही पर फिर छिड़ी बहस
Opinion

लोकतंत्र का असली अर्थ क्या है? अधिकार, अभिव्यक्ति और जवाबदेही पर फिर छिड़ी बहस

नई दिल्ली। लोकतंत्र केवल मतदान करने या सरकार चुनने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिकों को अपनी बात रखने, असहमति जताने, अधिकारों की रक्षा करने और सत्ता से जवाब मांगने का अवसर भी देता है। देशभर में विभिन्न मुद्दों को लेकर हो रहे प्रदर्शनों के बीच लोकतंत्र के वास्तविक स्वरूप और उसकी भूमिका पर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। इंडिया डेवलपमेंट रिव्यू (IDR) ने अपने लेख में सिविल सोसाइटी से जुड़े लोगों के विचारों के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया है कि आम नागरिकों के जीवन में लोकतंत्र का क्या महत्व है। लेख के अनुसार, पिछले कुछ हफ्तों में मजदूरों, छात्रों, कलाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों से जुड़े लोगों ने सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज उठाई है। इनमें ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो पहली बार सार्वजनिक रूप से अपनी असहमति व्यक्त करने और अपनी बात सुने जाने की मांग कर रहे हैं। विकास, सा...
सत्ता से सवाल या व्यवस्था में व्यवधान?
Opinion

सत्ता से सवाल या व्यवस्था में व्यवधान?

सत्ता से सवाल या व्यवस्था में व्यवधान?(दिल्ली के प्रदर्शनों से उठते सवाल)- डॉ. सत्यवान सौरभभारत में शांतिपूर्ण सभा का अधिकार लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण आधार है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ख) सभी नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनसभाएँ, धरने, प्रदर्शन और रैलियाँ केवल असहमति व्यक्त करने के माध्यम नहीं हैं, बल्कि नागरिकों को अपनी माँगें रखने, सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करने और सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित करने का अवसर भी देती हैं। वर्तमान भारत में विरोध-प्रदर्शनों की अनुमति, सार्वजनिक स्थानों पर प्रतिबंध, सड़क जाम और निवारक कानूनी प्रावधानों को लेकर होने वाली बहस ने इस अधिकार की प्रासंगिकता को और बढ़ा दिया है।भारत का स्वतंत्रता आंदोलन सामूहिक लामबंदी और शांतिपूर्ण प्रतिरोध की शक्ति का ऐतिहासिक उदाहरण है। मह...
जब मशीनें स्वयं निर्णय लेने लगें
Opinion, technology

जब मशीनें स्वयं निर्णय लेने लगें

(स्वायत्त कृत्रिम बुद्धिमत्ता : सुरक्षा, विश्वसनीयता और जवाबदेही की चुनौती)  — डॉ. सत्यवान सौरभ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का विकास आधुनिक तकनीकी इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। अब तक अधिकांश डिजिटल प्रणालियाँ मनुष्य के निर्देशों के अनुसार सीमित कार्य करती थीं, लेकिन स्वायत्त कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आगमन ने इस स्थिति को बदल दिया है। ऐसे एआई एजेंट न केवल प्रश्नों के उत्तर दे सकते हैं, बल्कि स्वतंत्र रूप से योजनाएँ बना सकते हैं, निर्णय ले सकते हैं, डिजिटल उपकरणों का उपयोग कर सकते हैं और निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कई चरणों में कार्य भी कर सकते हैं। इससे प्रशासन, स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग और अनुसंधान के क्षेत्रों में नई संभावनाएँ खुली हैं। किंतु जैसे-जैसे इन प्रणालियों की स्वायत्तता बढ़ रही है, वैसे-वैसे उनकी सुरक्षा, विश्वसनीयता और जवाबदेही को लेकर चिं...
आईएएस-एचसीएस की सफलता: प्रतिभा की परीक्षा या संसाधनों की ताकत?
Opinion

आईएएस-एचसीएस की सफलता: प्रतिभा की परीक्षा या संसाधनों की ताकत?

- डॉ. सत्यवान सौरभ भारतीय समाज में आईएएस और एचसीएस जैसी प्रशासनिक सेवाओं में चयन को प्रतिभा, परिश्रम, अनुशासन और मेधा की बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है। इन सेवाओं में पहुँचने का सपना लाखों युवा देखते हैं, लेकिन सफलता कुछ ही अभ्यर्थियों को मिल पाती है। इस लंबी प्रतिस्पर्धा के बीच एक सवाल बार-बार उठता है कि क्या इन परीक्षाओं में केवल प्रतिभा और मेहनत निर्णायक होती हैं, या अभ्यर्थी की पारिवारिक पृष्ठभूमि, आर्थिक स्थिति और सामाजिक संसाधन भी उसकी सफलता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं? इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया जाए, तो प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी में मौजूद अवसरों की असमानता के कई पहलू सामने आते हैं। जब किसी एचसीएस या आईएएस टॉपर की सफलता की कहानी सामने आती है, तो उसके अंकों, रैंक, मेहनत और संघर्ष की चर्चा होती है। कई बार यह जानकारी भी सामने आती है कि अभ्यर्थी कई वर्षों से तैयार...
जीते जी सेवा, यही सच्चा श्राद्ध
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जीते जी सेवा, यही सच्चा श्राद्ध

माँ-बाप के जीवन में सम्मान और सहारा नहीं, तो मृत्यु के बाद के कर्मकांड अधूरे हैं - डॉ. प्रियंका सौरभ भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है। हमारे संस्कारों में माँ के चरणों में ममता, त्याग और करुणा का संसार दिखाई देता है, तो पिता के जीवन में परिश्रम, जिम्मेदारी और सुरक्षा की छाया। माँ-बाप अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपनी इच्छाओं को पीछे छोड़ देते हैं। वे अपनी जरूरतें कम कर बच्चों की जरूरतें पूरी करते हैं। उनकी खुशियाँ बच्चों की मुस्कान में बसती हैं और उनका जीवन परिवार को सँवारने में बीत जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस उम्र में उन्हें सबसे अधिक प्रेम, सम्मान और सहारे की आवश्यकता होती है, उसी समय कई बुजुर्ग अपने ही घर में उपेक्षा के शिकार हो जाते हैं। हमारे समाज में श्राद्ध, तर्पण और पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों को याद करने की परंपरा है। लोग श्रद्धापूर्वक भोजन करा...
रेहड़ी वाली पर कार्रवाई, शोरूमों पर भी नजर हो
Opinion

रेहड़ी वाली पर कार्रवाई, शोरूमों पर भी नजर हो

— डॉ. प्रियंका सौरभ हिसार में अतिक्रमण हटाने के नाम पर एक रेहड़ी वाली महिला का सामान फेंके जाने का दृश्य सामने आता है तो सवाल केवल एक महिला की रेहड़ी का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे प्रशासनिक रवैये पर उठता है। शहर को अतिक्रमण मुक्त करना नगर निगम की जिम्मेदारी है और सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों तथा रास्तों पर कब्जे हटाए जाने चाहिए। लेकिन कानून की असली परीक्षा तब होती है, जब उसके सामने कोई प्रभावशाली व्यक्ति नहीं, बल्कि रोज कमाकर परिवार चलाने वाली गरीब महिला खड़ी हो। नियम सबके लिए समान हैं तो कार्रवाई का तरीका और पैमाना भी सबके लिए समान होना चाहिए। अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई यदि जरूरी है तो वह दुकानदार, रेहड़ी वाला, शोरूम मालिक या किसी भी अन्य व्यक्ति के लिए समान रूप से होनी चाहिए। सड़क पर कुछ फीट तक सामान फैलाकर बैठी रेहड़ी को अतिक्रमण मानना उचित है तो दुकान के बाहर फुटपाथ और सड़क तक फैलाया...
डिजिटल युग में निजता: अधिकार और बढ़ती चुनौतियाँ
Opinion

डिजिटल युग में निजता: अधिकार और बढ़ती चुनौतियाँ

- डॉ.  सत्यवान सौरभ आज मनुष्य की डिजिटल पहचान उसके भौतिक अस्तित्व जितनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। हम क्या खोजते हैं, कहाँ जाते हैं, क्या खरीदते हैं, किन लोगों से संवाद करते हैं और किन विषयों में रुचि रखते हैं—इन सबका एक डिजिटल निशान पीछे छूटता जाता है। ऐसे में प्रश्न केवल यह नहीं है कि हमारी जानकारी किसके पास है, बल्कि यह भी है कि उस जानकारी पर हमारा कितना नियंत्रण है। इसी संदर्भ में डिजिटल युग में निजता का प्रश्न व्यक्ति की स्वतंत्रता, गरिमा और स्वायत्तता से जुड़ी एक गंभीर संवैधानिक और सामाजिक चुनौती बनकर उभरा है। निजता व्यक्ति का वह अधिकार है जिसके माध्यम से वह अपनी व्यक्तिगत जानकारी, पहचान और निजी जीवन तक दूसरों की पहुँच को नियंत्रित करता है। भारत में इस अधिकार को ऐतिहासिक महत्व तब मिला जब सर्वोच्च न्यायालय ने के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले में निजता को संविधान ...